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यूपी राजनीति

UP Politics: मायावती ने सपा के PDA रथ के रंग पर सवाल उठाया, कहा- ‘लाल से भगवा हो गया?’

उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान करतीं बसपा प्रमुख मायावती
फाइल फोटो: उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान करतीं बसपा प्रमुख मायावती। फोटो: Ministry of Parliamentary Affairs / Wikimedia Commons, GODL-India (क्रॉप/रीसाइज़ किया गया)

UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। सभी दल अपनी रणनीति को धार देने में जुटे हैं। इसी बीच बसपा सुप्रीमो मायावती ने समाजवादी पार्टी के PDA रथ को लेकर अखिलेश यादव पर सीधा निशाना साधा है। मायावती का आरोप है कि सपा का रथ अब पार्टी के पुराने लाल रंग से ज्यादा भगवा रंग में नजर आ रहा है। उन्होंने इसे चुनावी फायदे और मुस्लिम वोटों पर कम होते भरोसे से जोड़ा है। यह हमला ऐसे समय आया है जब यूपी में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोटरों को अपने पाले में करने की होड़ तेज है।

मायावती ने सोशल मीडिया पर साफ लिखा कि सपा का PDA रथ आरएसएस और भाजपा वाले भगवा रंग में दिख रहा है। उनके मुताबिक लोगों में चर्चा है कि सपा या तो चुनावी फायदे के लिए रंग बदल रही है या फिर मुस्लिम वोटों पर पहले जैसा भरोसा नहीं रह गया है। यह बयान विपक्षी खेमे के अंदरूनी टकराव को भी दर्शाता है। बसपा और समाजवादी पार्टी दोनों दलित-पिछड़े वोट बैंक पर दावा करती रही हैं। अब चुनाव से पहले यह रस्साकशी और तेज हो गई है।

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नीचे दिए गए सारणी में मायावती के प्रमुख आरोप और उनके दावों को संक्षेप में देखा जा सकता है।

विषय मायावती का आरोप/दावा संदर्भ
PDA रथ का रंग लाल से ज्यादा भगवा रंग में दिख रहा है RSS-BJP रंग से जोड़कर सवाल
मुस्लिम वोट पहले सपा को वोट दिया, फिर भी BJP नहीं रुकी; अब रुख BSP की ओर बार-बार वोट देने का फायदा नहीं
PDA फॉर्मूला मतलब बार-बार बदलता है; कभी पिछड़े-दलित, कभी पंडित फॉर्मूले की स्थिरता पर सवाल
अंबेडकरवादी छवि नीले कपड़े पहनकर तस्वीरें, जनता ने फेक कहा प्रतीकात्मक राजनीति पर हमला
वोटर शिफ्ट ब्राह्मण और मुस्लिम वोटर BSP के पक्ष में आ रहे हैं सर्वजन रणनीति का दावा

ये बिंदु मायावती के हालिया हमले का केंद्र हैं। अब विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह विवाद क्यों महत्वपूर्ण है।

UP Politics: मायावती ने PDA रथ पर क्या आरोप लगाया?

मायावती का मुख्य निशाना सपा का PDA रथ है। उन्होंने कहा कि यह रथ पार्टी के पारंपरिक लाल रंग की जगह भगवा रंग में ज्यादा नजर आ रहा है। भगवा रंग को उन्होंने आरएसएस और भाजपा से जोड़कर पेश किया। उनका सवाल साफ है कि क्या समाजवादी पार्टी चुनावी फायदे के लिए अपनी पहचान बदल रही है।

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PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से इसी फॉर्मूले के जरिए सामाजिक समीकरण जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। मायावती इसे अवसरवादी बता रही हैं। उनका कहना है कि रथ का रंग बदलना सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि राजनीति के रुख में बदलाव का संकेत है। यूपी जैसे राज्य में रंग, प्रतीक और नारे बहुत मायने रखते हैं। इसलिए यह हमला सिर्फ रथ तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सपा की पूरी चुनावी रणनीति पर सवाल बन गया है।

मायावती ने यह भी कहा कि अगर कोई पार्टी अपने मूल रंग और पहचान से हट रही है तो जनता को सोचना चाहिए कि वजह क्या है। यह बयान बसपा के कार्यकर्ताओं में चर्चा का विषय बन गया है। वहीं सपा की तरफ से अभी तक सीधा जवाब सामने नहीं आया है, लेकिन चुनावी मौसम में ऐसे हमले आम होते जा रहे हैं।

सपा का रंग बदलने का मतलब क्या है?

मायावती के अनुसार रंग बदलने का मतलब दो संभावनाएं हैं। पहली, सपा चुनावी फायदे के लिए अपनी छवि नरम या व्यापक बनाना चाहती है। दूसरी, उसे मुस्लिम वोटों पर पहले जितना भरोसा नहीं रह गया है। दोनों आरोप गंभीर हैं।

समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुस्लिम-यादव समीकरण पर टिकी रही है। लाल रंग उसके संघर्ष और समाजवादी विचारधारा से जुड़ा माना जाता है। भगवा रंग को हिंदुत्व राजनीति से जोड़कर देखा जाता है। मायावती इसी अंतर को उभार रही हैं। उनका इशारा यह है कि सपा अब सिर्फ अल्पसंख्यक वोट पर निर्भर नहीं रहना चाहती और दूसरे सामाजिक समूहों तक पहुंचना चाहती है।

यह रणनीति व्यावहारिक हो सकती है, लेकिन मायावती इसे सिद्धांतहीन बता रही हैं। चुनाव में पार्टियां अक्सर अपनी छवि को व्यापक बनाने की कोशिश करती हैं। सपा भी PDA के जरिए दलित और पिछड़ों तक पहुंच बढ़ाना चाहती है। मायावती कह रही हैं कि यह कोशिश दिखावटी है। रंग का मुद्दा प्रतीकात्मक जरूर है, लेकिन यूपी की राजनीति में प्रतीक अक्सर बड़े संदेश बन जाते हैं।

UP Politics: मुस्लिम वोट को लेकर मायावती का क्या कहना है?

मायावती ने मुस्लिम वोट बैंक पर भी सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि पिछले चुनावों में मुस्लिम समाज ने बड़ी संख्या में सपा का साथ दिया, लेकिन भाजपा को सत्ता में आने से नहीं रोका जा सका। उनका सवाल है कि बार-बार एक ही पार्टी को वोट देने के बाद भी अगर नतीजा नहीं बदलता तो उसी पार्टी को वोट क्यों दिया जाए।

यह तर्क बसपा की पुरानी लाइन से मिलता-जुलता है। मायावती दावा कर रही हैं कि मुस्लिम समाज का रुख अब बसपा की तरफ बदल रहा है। उन्होंने ब्राह्मण समाज का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक अपरकास्ट खासकर ब्राह्मण और मुस्लिम वोटर बसपा के पक्ष में आते दिख रहे हैं। यह दावा कितना सही है, यह चुनाव में ही साबित होगा। फिलहाल यह बसपा की सर्वजन रणनीति का हिस्सा लगता है।

यूपी में मुस्लिम वोट करीब 19 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। यह वोट बैंक किसी एक दल के पक्ष में निर्णायक हो सकता है। सपा इसे अपना पारंपरिक आधार मानती रही है। मायावती अब उसी आधार पर सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं। उनका संदेश साफ है कि वोट देने भर से काम नहीं चलता, नतीजा भी दिखना चाहिए।

PDA फॉर्मूला पर मायावती के सवाल क्या हैं?

मायावती ने PDA फॉर्मूले की स्थिरता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सपा अलग-अलग समय पर PDA का मतलब अपने हिसाब से बताती रही है। कभी इसमें पिछड़े और दलित शामिल होते हैं, तो कभी पंडित समाज का जिक्र हो जाता है। यह बदलाव मायावती को संदेह पैदा करता है।

उन्होंने अखिलेश यादव पर खुद को अंबेडकरवादी दिखाने का आरोप भी लगाया। कुछ मौकों पर अखिलेश ने नीले रंग के कपड़े पहनकर तस्वीरें खिंचवाईं। मायावती का कहना है कि जनता ने इसे स्वीकार नहीं किया और सपा की इस कोशिश को फेक अंबेडकरवादी कहकर खारिज कर दिया। नीला रंग बसपा और अंबेडकरवादी राजनीति से जुड़ा माना जाता है। इसलिए यह आरोप प्रतीकात्मक टक्कर को और तेज करता है।

मायावती दोहराती हैं कि बसपा की राजनीति किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। पार्टी सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की सोच के साथ काम करती है। उनका फोकस रोजगार, सम्मान और बेहतर जीवन पर है। PDA रथ वाले हमले के जरिए वे यही संदेश देना चाहती हैं कि बसपा सामाजिक इंजीनियरिंग से ऊपर उठकर सबकी पार्टी है।

UP Politics: BSP किसे अपना वोटर मान रही है?

मायावती के बयान से साफ है कि बसपा अब सिर्फ दलित वोट तक सीमित नहीं रहना चाहती। वे ब्राह्मण, मुस्लिम और अन्य वर्गों तक पहुंच बनाने की बात कर रही हैं। यह रणनीति 2007 वाले सर्वजन फॉर्मूले की याद दिलाती है, जब बसपा ने व्यापक गठजोड़ बनाकर सरकार बनाई थी।

चुनाव नजदीक होने के कारण हर दल सामाजिक समीकरण जोड़ने में लगा है। सपा PDA पर जोर दे रही है, भाजपा अपने विकास और ध्रुवीकरण वाले मुद्दों पर काम कर रही है और बसपा सर्वजन कार्ड खेल रही है। मायावती का यह हमला बसपा को चर्चा में बनाए रखने की कोशिश भी है। छोटे दलों के लिए मीडिया स्पेस पाना चुनाव से पहले जरूरी होता है।

कुल मिलाकर मायावती का हमला सपा की चुनावी तैयारी पर सीधा प्रहार है। PDA रथ का रंग, मुस्लिम वोटों का भरोसा और अंबेडकरवादी छवि, ये तीनों मुद्दे अब बहस का हिस्सा बन गए हैं। यूपी की राजनीति में ऐसे आरोप-प्रत्यारोप आम हैं, लेकिन इनका असर वोटिंग पैटर्न पर कितना पड़ता है यह बाद में पता चलेगा। फिलहाल विपक्षी खेमे में एकता की जगह टकराव ज्यादा दिख रहा है। जनता आखिर किसे अपनाती है, यह फैसला मतदान के दिन ही होगा।

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फीचर्ड फोटो (फाइल): The Member of Parliament, Km. Mayawati casting her vote in the Vice Presidential election at Parliament House, in New Delhi on August 07, 2012.jpg, Ministry of Parliamentary Affairs, Wikimedia Commons, GODL-India लाइसेंस के तहत; 1280×720 में क्रॉप/रीसाइज़ किया गया।

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