मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश की सर्वोच्च अदालत ने संसद और विधानसभाओं के भीतर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों के चक्रानुक्रम की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से साफ इंकार कर दिया है।
मामले की सुनवाई करने वाली पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के अलावा न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। इस न्यायिक पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस पुराने फैसले में किसी भी तरह का दखल देने से मना कर दिया, जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा नौ की उपधारा एक के खंड सी को सही ठहराया गया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह अपील की गई थी कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में नियमित फेरबदल या रोटेशन की व्यवस्था लागू की जाए, जिसे शीर्ष अदालत ने स्वीकार नहीं किया। उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली इस याचिका के खारिज होने से मौजूदा कानूनी प्रावधान ही प्रभावी बने रहेंगे।
कानूनी प्रावधान और आगे की स्थिति
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, इस अदालती आदेश के बाद Delimitation Act, 2002 के प्रावधानों में बदलाव की गुंजाइश फिलहाल समाप्त हो गई है। यह मामला देश की विधाई संस्थाओं में प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ था, जिस पर अदालत का रुख अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है।
इस विषय से जुड़े अन्य कानूनी पहलुओं या भविष्य के घटनाक्रमों को लेकर फिलहाल विस्तृत जानकारी का इंतजार किया जा रहा है। फैसले के विस्तृत दस्तावेजों के अध्ययन के बाद ही इस दिशा में आगे की तस्वीर पूरी तरह साफ हो पाएगी। विस्तार से पढ़ें: Democratic Bharat Live
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स्रोत: द हिंदू
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