CEC Appointment Law: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का कानून क्यों फंसा विवाद में? सुप्रीम कोर्ट का खंडित फैसला समझिए

CEC Appointment Law
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संक्षेप में

  • CEC Appointment Law के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री शामिल हैं।
  • याचिकाकर्ताओं ने समिति में CJI की जगह मंत्री को शामिल करने से सरकारी प्रभाव बढ़ने की आशंका जताई।
  • लेख के अनुसार, मामला संविधान पीठ को भेजने पर दोनों जजों की राय अलग रही।
  • मतभेद के बाद पीठ के गठन का प्रश्न मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया।
  • कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।

CEC Appointment Law: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का 2023 वाला कानून फिर चर्चा में है। इस कानून में चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया गया है। इसी प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। बुधवार को दो जजों की पीठ ने खंडित फैसला सुनाया। दोनों जज इस बात पर सहमत नहीं हुए कि मामला संविधान पीठ के पास जाए या नहीं। अब फैसला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के पास गया है। बड़ी पीठ कितने जजों की बने, यह वे तय करेंगे।

मामला आसान नहीं है। चुनाव कराने वाली संस्था की स्वतंत्रता इससे जुड़ी है। सरकार कहती है कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है। याचिकाकर्ता कहते हैं कि नई समिति में सरकार का पलड़ा भारी हो गया है।

बिंदु विवरण
कानून CEC और EC नियुक्ति अधिनियम, 2023
पुरानी समिति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, CJI
नई समिति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, PM नामित कैबिनेट मंत्री
विवाद CJI की जगह मंत्री को जगह देना
सुप्रीम कोर्ट दो जजों की राय अलग, मामला CJI के पास

CEC Appointment Law: 2023 के कानून में क्या बदला?

दिसंबर 2023 में संसद ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम पास किया। इसके तहत चयन समिति तीन सदस्यों की है। प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।

पहले व्यवस्था यह थी कि समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। नया कानून आने के बाद CJI की जगह सरकार का मंत्री आ गया। नतीजा यह हुआ कि तीन में से दो सदस्य कार्यपालिका यानी सरकार के हो गए।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे नियुक्ति पर सरकार का असर बढ़ जाता है। चुनाव आयोग जैसी संस्था को कार्यपालिका से दूर रखना चाहिए। यही इस पूरे विवाद की जड़ है।

CEC Appointment Law: CJI को हटाने पर सवाल क्यों उठे?

यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2023 वाले अनूप बरनवाल फैसले से जुड़ा है। उस समय पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI रहेंगे। अदालत ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को बहुत जरूरी माना था। चुनाव कराने वाली संस्था सरकार के प्रभाव से बची रहे, यही संदेश था।

कुछ महीनों बाद संसद ने नया कानून बना दिया। CJI की जगह प्रधानमंत्री का नामित मंत्री आ गया। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अदालत ने जो संतुलन चाहा था, कानून ने उसे बदल दिया। सरकार का कहना है कि नियुक्ति का कानून बनाना संसद का काम है। अदालत ने खुद कहा था कि संसद कानून बना सकती है।

दोनों तरफ के तर्क मजबूत हैं। इसलिए मामला सिर्फ एक पद का नहीं रह गया। यह चुनाव आयोग की छवि और भरोसे से जुड़ गया है।

CEC Appointment Law: सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को क्या हुआ?

मामले की सुनवाई पांच दिन चली। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने अलग-अलग राय दी। दोनों इस बात पर एकमत थे कि अब मामला मुख्य न्यायाधीश के सामने जाए। बड़ी पीठ कितनी सदस्यों की हो, यह CJI तय करें।

जस्टिस दत्ता का कहना था कि मामले को संविधान पीठ में भेजना जरूरी नहीं। सुप्रीम कोर्ट पहले ही चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के सिद्धांत तय कर चुका है। अब सिर्फ यह देखना है कि 2023 का कानून उन सिद्धांतों पर खरा उतरता है या नहीं। यह काम मौजूदा पीठ भी कर सकती है।

जस्टिस शर्मा की राय अलग थी। उन्होंने कहा कि इस कानून की संवैधानिक वैधता पर अभी कोई आधिकारिक फैसला नहीं आया है। पहली बार अदालत को यह तय करना है कि CJI की जगह मंत्री को समिति में रखना संविधान के अनुकूल है या नहीं। इसलिए संविधान पीठ का फैसला जरूरी है।

दोनों जजों की राय अलग होने के कारण अंतिम फैसला नहीं हो पाया। कानून अभी वैसा का वैसा है। अगला कदम बड़ी पीठ का गठन होगा।

चयन समिति पर कौन से सवाल उठे?

जस्टिस दत्ता ने समिति की बनावट पर कई सवाल उठाए। उन्होंने साफ कहा कि ये प्रारंभिक टिप्पणियां हैं, अंतिम फैसला नहीं। उनके अनुसार समिति में प्रधानमंत्री और उनके नामित मंत्री होने से कार्यपालिका के दो सदस्य हो जाते हैं।

उन्होंने सामूहिक जिम्मेदारी का जिक्र किया। प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री से यह उम्मीद करना कठिन है कि वह अपने प्रधानमंत्री के खिलाफ जाएगा। ऐसी स्थिति में मंत्री स्वतंत्र संतुलन नहीं दे सकता। कागज पर फैसला 2:1 सरकार के पक्ष में जा सकता है। इससे सरकार के पास वीटो जैसी स्थिति बन सकती है। विपक्ष के नेता की मौजूदगी कमजोर पड़ सकती है।

जस्टिस दत्ता ने एक और बात कही। चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना काफी नहीं है। वह स्वतंत्र दिखना भी चाहिए। उन्होंने क्रिकेट का उदाहरण दिया। अगर अंपायर को एक टीम का कप्तान चुनता है और उसी टीम की जीत होती है तो सही फैसलों के बावजूद संदेह बना रहता है। चुनाव आयोग के साथ भी यही बात लागू होती है।

उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों वाले तर्क को भी काटा। यह कहना गलत है कि भारत में जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं। कार्यपालिका की भी भूमिका होती है। इसलिए न्यायिक कॉलेजियम का उदाहरण देकर चुनाव आयुक्तों की समिति से स्वतंत्र सदस्य हटाना ठीक नहीं ठहराया जा सकता।

CEC Appointment Law: अब आगे क्या होगा?

मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के पास है। वे तय करेंगे कि कितने जजों की पीठ बने। पीठ ने संविधान से जुड़े मामलों में हो रही देरी पर भी चिंता जताई। CJI से स्थायी पांच सदस्यीय संविधान पीठ बनाने पर विचार करने को कहा गया है।

अभी 2023 के कानून की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। बड़ी पीठ बनेगी तब जाकर यह तय होगा कि चयन समिति में CJI की जगह मंत्री रखना सही है या नहीं। तब तक नियुक्तियां मौजूदा कानून के तहत ही होंगी।

यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं है। चुनाव आयोग जनता के भरोसे पर चलता है। नियुक्ति का तरीका जितना पारदर्शी और संतुलित दिखेगा, संस्था उतनी मजबूत मानी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम इसी भरोसे से जुड़ा है। बड़ी पीठ का गठन और उसके बाद का फैसला आने वाले चुनावों के माहौल को भी प्रभावित कर सकता है।

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Sudhanshu Tiwari

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