CJP Protest: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के विरोध में और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर कॉकरोच जनता पार्टी ने मुंबई के शिवाजी पार्क में प्रदर्शन किया। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और लेफ्ट के स्टूडेंट विंग आइशा की ओर से भी विरोध हुआ। मुंबई के कार्यक्रम में नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी, विशाल ददलानी और महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी शामिल हुए। गांधी जयंती पर हुए इस प्रदर्शन में संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ नारे लगे और इस्तीफे की तख्तियां दिखीं।
सवाल यह है कि आंदोलन केवल एक अधिकारी के इस्तीफे तक सीमित रहेगा या मतदाता सूची से नाम काटने की प्रक्रिया और चुनाव की पारदर्शिता तक जाएगा। फिलहाल पार्टी ने पांच मांगें रखी हैं और जंतर-मंतर पर फिर प्रदर्शन की चेतावनी दी है। आरोप पार्टी के दावे हैं। चुनाव आयोग की ओर से इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है।
CJP Protest: मुंबई और दिल्ली में प्रदर्शन में क्या हुआ?
शिवाजी पार्क के आसपास स्थानीय विरोध और दादर स्टेशन तक सुरक्षा के बावजूद प्रदर्शनकारी इस्तीफे की मांग वाले पोस्टर लेकर जुटे। स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया समेत कई संगठनों के कार्यकर्ता और युवा शामिल थे। तिरंगे के साथ मराठी और अंग्रेजी नारे लिखी तख्तियां दिखीं। गायक विशाल ददलानी ने कहा कि वे लोकतंत्र बचाने के लिए आए हैं और सभी राजनीतिक दलों को समर्थन करना चाहिए।
भीड़ को संबोधित करते हुए पार्टी नेता अभिजीत दीपके ने चेतावनी दी कि यदि ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते, तो जंतर-मंतर पर फिर आंदोलन होगा। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की आलोचना की। उनका दावा है कि 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मतदाता सूची में 40 लाख नाम जोड़े गए। यह दावा पार्टी का है और निर्वाचन आयोग ने इस रिपोर्ट के अनुसार इसे स्वीकार नहीं किया है।
CJP ने कौन-सी पांच मांगें रखी हैं?
पार्टी की सूची में पहली मांग ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा है। दूसरी मांग जनवरी 2025 की मतदाता सूची को फिर लागू करने की है। तीसरी मांग है कि एसआईआर विवाद खत्म होने तक देश में कहीं चुनाव न हों। चौथी मांग एसआईआर की जांच के लिए कमेटी बनाने की है। पांचवीं मांग 2023 के उस कानून को खत्म करने की है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति होती है, और उसकी जगह नया कानून लाने की है।
पार्टी का यह भी आरोप है कि दो वर्षों में 13 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। उसके अनुसार 2024 में पंजीकृत मतदाता 97 करोड़ थे और लोकसभा चुनाव में एनडीए व इंडिया गठबंधन के वोटों का अंतर 2 प्रतिशत था। नियुक्ति के समय को लेकर भी आरोप लगाया गया है। ये आंकड़े पार्टी के बयान हैं। आयोग की आधिकारिक संख्या से मिलान किए बिना इन्हें तथ्य नहीं माना जा सकता।
CJP Protest: नाम काटने की प्रक्रिया पर पारदर्शिता का सवाल क्यों उठ रहा है?
एसआईआर के दौरान कितने नाम काटे गए, किन कारणों से हटाए गए, कितने दोबारा जोड़े गए और कितनी आपत्तियां आईं, इस पर स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी की मांग उठ रही है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह भी पूछा जा रहा है कि हटाए गए नामों में कितने अवैध रूप से बसे लोगों के थे। जब तक कारण, संख्या और आपत्ति निपटान का ब्योरा सामने नहीं आता, आरोप और सफाई दोनों अधूरी रहती हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कुछ फैसलों पर आपत्ति का जिक्र है। आयोग ने विज्ञप्ति में कहा है कि फैसले सर्वसम्मति से होते हैं और दोनों आयुक्तों की चिट्ठी एक अधिकारी से जुड़ी है, कामकाज से नहीं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त या दोनों आयुक्तों का अलग सार्वजनिक बयान अब तक नहीं आया है।
ये भी पढ़ें: जो जिम्मेदारी मिलेगी वो निभाएंगी, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले आराधना मिश्रा का बयान
डिजिटल सिस्टम और दस्तावेजी सबूत पर क्या सवाल हैं?
चुनाव आयोग के केंद्रीय सॉफ्टवेयर, डेटा तक पहुंच और संशोधन की प्रक्रिया को लेकर स्वतंत्र ऑडिट की मांग भी चर्चा में है। पारदर्शिता तभी मानी जाएगी, जब संशोधन का लॉग और जिम्मेदारी सार्वजनिक रूप से समझाई जाए। केवल आरोप या केवल सफाई से संदेह नहीं मिटता।
कॉकरोच जनता पार्टी फिलहाल राजनीतिक आरोप लगा रही है। जवाबदेही तय करने की मांग के साथ यह भी जरूरी है कि उसके पास कौन-से रिकॉर्ड, सूची या दस्तावेज हैं। आरोप और सबूत अलग चीजें हैं। बिना दस्तावेज के इस्तीफे की मांग राजनीतिक बयान रहती है।
ये भी पढ़ें: UP Rajya Sabha: बीजेपी किन जातीय समीकरणों पर दांव लगा सकती है, जानें पूरा गणित
CJP Protest: इस्तीफा नहीं मिला तो अगला कदम और कानूनी सीमा क्या होगी?
पार्टी ने देशभर में प्रदर्शन और दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन का ऐलान किया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, पुलिस अनुमति और कानून-व्यवस्था की रणनीति सार्वजनिक नहीं की गई है। संवैधानिक पद के खिलाफ नारे और आपराधिक कार्रवाई की मांग तब तक राजनीतिक विरोध है, जब तक अदालत या जांच एजेंसी कोई निष्कर्ष नहीं देती।
आंदोलन इस्तीफे की लड़ाई भी है और मतदाता सूची की पारदर्शिता का सवाल भी। दोनों तरफ से संख्या, कारण और दस्तावेज सामने आने के बाद ही यह तय होगा कि विवाद व्यक्ति पर टिका है या प्रक्रिया पर।
फीचर्ड फोटो (फाइल): CEC Gyanesh Kumar at International IDEA Headquarters,Stockholm,Sweden 2025 JPG.jpg, Zealaski, Wikimedia Commons, CC0 लाइसेंस के तहत; 1280×720 में क्रॉप/रीसाइज़ किया गया।


