1991 से लेकर 2022 तक का पन्ना एक सा नहीं है। कभी एक पार्टी कई चुनाव तक टिकी रही, कभी फैसला कुछ हजार वोटों पर अटक गया। आंकड़े निर्वाचन आयोग की सांख्यिकीय रिपोर्ट से लिए गए हैं। इतिहास, बड़ी जीत और आगे का गणित नीचे अलग-अलग सवालों में है।
1991 से 2000 तक पीलीभीत बीजेपी के पास कैसे रही?
1991 का चुनाव अयोध्या कांड के कुछ महीने बाद हुआ था। माहौल बीजेपी के पक्ष में था। बी.के. गुप्ता ने कांग्रेस के रियाज अहमद को 19,978 वोटों से हराया। गुप्ता के खाते में 47,617 वोट आए, रियाज अहमद 27,639 पर रह गए। 1993 में जोड़ी लगभग वही रही, फर्क इतना था कि रियाज अहमद जनता पार्टी के टिकट पर थे। गुप्ता इस बार 17,871 वोटों के अंतर से जीते। 1996 में पार्टी ने टिकट काट दिया और राज राय सिंह को उतारा। नाराज बी.के. गुप्ता निर्दलीय मैदान में आ गए। फिर भी राज राय सिंह ने एसजेपी(आर) के हारून अहमद को 10,606 वोटों से मात दी। राज राय सिंह कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं और सदस्यता छोड़ दी। 2000 के उपचुनाव में बी.के. गुप्ता फिर बीजेपी के चिन्ह पर आए और सपा के एजाज अहमद को 14,432 वोटों से हराया। चार मौके लगातार बीजेपी के नाम रहे।
2002 से 2012 तक रियाज अहमद ने सपा को तीन जीत कैसे दिलाईं?
2002 में मुकाबला फिर रियाज अहमद और बी.के. गुप्ता के बीच सिमटा। इस बार सपा ने बाजी पलटी। रियाज अहमद 9,971 वोटों के अंतर से जीते। उनके 35,700 वोट पड़े, गुप्ता 25,729 पर अटके। 2007 में वही दो चेहरे आमने-सामने थे। रियाज अहमद को 50,947 वोट मिले, गुप्ता 46,912 पर सिमटे। अंतर गिरकर 4,035 वोट रह गया। 1991 से 2022 के बीच यह सबसे पतली जीत थी। प्रदेश में बसपा की लहर चल रही थी, पर यहां हेमराज वर्मा तीसरे नंबर पर रह गए। 2012 में सपा को लखनऊ में पूरा बहुमत मिला, पीलीभीत पर लड़ाई फिर भी कड़ी रही। रियाज अहमद ने बसपा के संजय सिंह गंगवार को 4,235 वोटों से पछाड़ा। रियाज के 61,578 और संजय के 57,343 वोट आए। बीजेपी उस साल तीसरे स्थान पर चली गई थी।
2017 और 2022 में संजय सिंह गंगवार की जीत कितनी अलग रही?
2017 में बीजेपी ने 2012 वाले बसपा चेहरे संजय सिंह गंगवार को टिकट दे दिया। उन्होंने 1,36,486 वोट हासिल किए और सपा के रियाज अहमद को 43,356 वोटों के बड़े अंतर से हराया। रियाज 93,130 पर रह गए। तीन दशक के आंकड़ों में यह सबसे चौड़ी जीत थी। बसपा के अरशद खान को 14,532 वोट मिले। 2022 में संजय सिंह गंगवार फिर उतारे गए, पर मुकाबला कांटे का निकला। सपा की तरफ से शैलेंद्र सिंह गंगवार मैदान में थे। संजय को 1,25,506 और शैलेंद्र को 1,18,536 वोट मिले। फैसला 6,970 वोटों से हुआ। बसपा के शाने अली 12,099 वोटों पर अटके। कांग्रेस के शकील अहमद को 1,042 वोट मिले, जो नोटा के 1,188 से भी कम थे।
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सामाजिक समीकरण 2027 में किसे झुकाव दे सकता है?
मुस्लिम वोटर, कुर्मी और दूसरे ओबीसी समूह तथा अनुसूचित जाति की आबादी यहां नतीजा तय करती रही है। 1991 से 2012 तक रियाज अहमद और बी.के. गुप्ता का बार-बार मुकाबला उसी बंटवारे को दिखाता है। 2017 के बाद गंगवार परिवार के दो नाम अलग-अलग खेमों में आ गए और अंतर सिकुड़ता चला गया। 2027 में बीजेपी को सीट बचानी है। सपा 2022 की हार मिटाना चाहती है। सपा और कांग्रेस अगर साथ चुनाव लड़ें तो बिखराव का गणित बदल सकता है। टिकट किसको मिलता है, जातिगत बैठकें कितनी जमती हैं और बूथ पर एजेंट कितना सक्रिय रहता है, इन्हीं बातों पर सीट झुक सकती है। लंबे रिकॉर्ड में बीजेपी ज्यादा बार आगे रही है, पर 2007, 2012 और 2022 के पतले अंतर याद दिलाते हैं कि छोटी सी हलचल भी नतीजा बदल देती है।
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हैट्रिक और सीट वापसी की चुनौती कितनी सख्त है?
बीजेपी 2017 और 2022 जीत चुकी है। तीसरी बार के लिए 2022 वाला 6,970 वोटों का मार्जिन बढ़ाना होगा। सपा के पास 2002, 2007 और 2012 की पुरानी हैट्रिक है, पर 2017 का बड़ा अंतर और 2022 की हार दोनों याद दिलाती हैं कि लहर अकेले काफी नहीं होती, स्थानीय चेहरा भी देखना पड़ता है। बसपा का वोट पिछले दो चुनावों में तेजी से गिरा है। कांग्रेस 2022 में नोटा से पीछे रह गई थी। मुख्य लड़ाई इसलिए फिर बीजेपी और सपा के बीच बैठती दिखती है। उम्मीदवार अगर स्थानीय जोड़ बैठा ले और विरोधी वोट एक झंडे के नीचे न आए, तो मौजूदा विधायक को राहत मिल सकती है। उलटा हुआ तो 2022 वाला पतला अंतर सपा के पाले में जा सकता है।
पीलीभीत का हिसाब छह बीजेपी और तीन सपा जीत का है। 2017 की चौड़ी जीत के बाद 2022 में अंतर घटकर 6,970 वोट रह गया। 2027 की तैयारी इसी मार्जिन के इर्द-गिर्द घूम रही है। आखिरी फैसला टिकट, गठबंधन और बूथ पर तैनात कार्यकर्ता तय करेंगे।
फीचर्ड फोटो (फाइल): Pilibhit railway station.webp, Pandit paritosh pandey, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 लाइसेंस के तहत; 1280×720 में क्रॉप/रीसाइज़ किया गया।


