जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर को दिल्ली में वो माहौल नहीं बना जो जुलाई के बाद विपक्ष और CJP की तरफ से बार-बार दोहराया जा रहा था। सरकार को झुकाने और सड़क पर उतरकर सत्ता को हिलाने की बातें कही जा रही थीं, लेकिन जंतर-मंतर पर उस दिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। न कोई बड़ा नेता पहुंचा, न भीड़ जमा हो पाई और न कोई ऐसा बवाल हुआ जो पिछले प्रदर्शन की याद दिलाता।
CJP के लीडर्स खुद जंतर-मंतर तक नहीं पहुंच पाए। ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के घर से निकलीं, लेकिन जंतर-मंतर नहीं पहुंचीं। अरविंद केजरीवाल भी वहां नहीं पहुंच पाए। राहुल गांधी दिल्ली से चेन्नई के लिए निकल गए और अखिलेश यादव सैफई चले गए। ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर विपक्षी एकता की जो तस्वीर गढ़ने की कोशिश हो रही थी, उस दिन वह साफ तौर पर टूटती नजर आई। CJP ने घोषणा की है कि रविवार को भी प्रदर्शन जारी रहेगा।
जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस की तैनाती ने योजना को पहले ही रोक दिया
जंतर-मंतर का दूसरा अध्याय शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया। दिल्ली पुलिस ने 30 हजार से ज्यादा जवान तैनात किए थे। हर रास्ते पर बैरिकेडिंग थी। जो भी जंतर-मंतर की तरफ बढ़ा, बैनर-पोस्टर लेकर निकला, उसे पहुंचने से पहले ही डिटेन कर लिया गया। गिनती के कुछ लोग वहां पहुंचे भी तो उनके नारे दिल्ली पुलिस की तैयारियों के आगे बेअसर रहे।
कनॉट प्लेस, रीगल सिनेमा, मिंटो ब्रिज और आकाशवाणी भवन के आसपास जो भी हंगामा करने की कोशिश हुई, पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। अभिजीत दिपके नहीं पहुंच पाए, ध्रुव राठी को मौका नहीं मिला और नेहा वोहरा की भी योजना अधूरी रह गई। पुलिस ने न सिर्फ भारी बल उतारा, बल्कि चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी लगाए, दर्जनों ड्रोन उड़ाए और सड़कों पर कीलें भी ठोंकीं। जो समर्थक इन सबके बाद भी कनॉट प्लेस के आसपास पहुंचे, उन्हें समझ नहीं आया कि आगे क्या करना है। कुछ लौट गए, बाकी को डिटेन कर लिया गया।
दोपहर तक जंतर-मंतर इलाका खाली, हिरासत में ज्यादा लोग
जंतर-मंतर के आसपास का पूरा इलाका उस दिन छावनी जैसा बना रहा। जुलाई में जहां पत्थरबाजी, लाठीचार्ज और देर रात तक बवाल हुआ था, वहां 10 अक्टूबर को सन्नाटा था। लुटियंस जोन में कड़ी पहरेदारी रही। संसद मार्ग, रफी मार्ग, अशोक रोड, रायसीना रोड, अकबर रोड, शाहजहां रोड और इंडिया गेट सर्किल की तरफ कुछ लोग जमा होने लगे, लेकिन पुलिस ने कुछ ही मिनटों में रास्ते खाली करा लिए।
दोपहर होते-होते सब कुछ ठंडा पड़ गया। सड़कों पर जितने लोग बचे थे, उससे ज्यादा 12 डिटेंशन सेंटरों में पड़े थे। जो प्रोटेस्टर्स जंतर-मंतर नहीं पहुंच पाए, उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के नाम पर नारेबाजी शुरू की और हिंदुत्व के खिलाफ नारे लगाए। बाबा खड़ग सिंह मार्ग के पास पुलिस बल कम होने पर पत्थरबाजी की खबर भी आई। शाम को कनॉट प्लेस में कुछ लोग जमा हुए तो पुलिस ने उन्हें खींच-खींचकर वैन में भर लिया।
सर्विलांस और कमांड सेंटर ने भी भूमिका निभाई
दिल्ली पुलिस ने इस बार सिर्फ सड़कों पर तैनाती नहीं की थी। सर्विलांस रूम बनाए गए थे, जहां से चप्पे-चप्पे की निगरानी चल रही थी। कमांड सेंटर से तुरंत जानकारी दी जा रही थी और पुलिस फौरन एक्शन ले रही थी। जुलाई वाले हंगामे को दोहराने नहीं दिया गया। CJP का जंतर-मंतर वाला प्लान पूरी तरह फेल रहा।
इस बीच विपक्षी नेताओं को एहतियातन हिरासत में लेने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। याचिका दायर की गई है और रविवार को स्पेशल बेंच इसकी सुनवाई करेगी। CJP का कहना है कि प्रदर्शन रविवार को भी जारी रहेगा, लेकिन 10 अक्टूबर की तस्वीर साफ है कि भारी पुलिस तैनाती और लीडर्स के न पहुंचने से योजना अधूरी रह गई।
विश्लेषण: लीडरशिप के बिना प्रदर्शन की सीमा
जुलाई में जंतर-मंतर पर जो भीड़ और हंगामा हुआ था, उसी को दोहराने की कोशिश 10 अक्टूबर को की जा रही थी। लेकिन जब मुख्य चेहरे खुद वहां नहीं पहुंच पाए और पुलिस ने हर रास्ते पर नियंत्रण कर लिया, तो समर्थकों की संख्या और संगठन दोनों कमजोर पड़ गए। विपक्षी दलों के बड़े नेताओं का अलग-अलग दिशा में जाना ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर एकता के दावे को कमजोर करता दिखा। CJP ने रविवार को जारी रखने की बात कही है, लेकिन 10 अक्टूबर का अनुभव बताता है कि बिना लीडरशिप और बिना पुलिस की अनुमति के सड़क पर उतरना आसान नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और आगे की कार्रवाई तय करेगी कि रविवार को स्थिति क्या बनती है।


