राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव आम विधानसभा चुनाव से काफी अलग होते हैं। इनमें आम मतदाता सीधे वोट नहीं डालते। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की 31 सीटें हैं और विधान परिषद में 100 सदस्य होते हैं। इस लेख में दोनों चुनावों की पूरी प्रक्रिया आसान भाषा में है।
राज्यसभा: यूपी की 31 सीटें
संविधान के अनुच्छेद 80 के मुताबिक, राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधि विधानसभा के निर्वाचित सदस्य चुनते हैं। यूपी के 403 विधायक इसके मतदाता हैं। मनोनीत सदस्य इसमें वोट नहीं डालते।
राज्यसभा सदस्य का कार्यकाल 6 साल होता है। हर दो साल में करीब एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं, इसलिए चुनाव भी किस्तों में होते हैं। उम्मीदवार की न्यूनतम उम्र 30 साल होनी चाहिए।
राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव में वोट कैसे गिने जाते हैं
राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति से होते हैं। विधायक उम्मीदवारों को 1, 2, 3 के क्रम में वरीयता देते हैं।
जीत के लिए एक तय कोटा चाहिए। कोटा निकालने का तरीका है: कुल वैध वोटों को सीटों की संख्या में एक जोड़कर भाग दें और नतीजे में एक जोड़ें। गिनती में हर वोट का मूल्य 100 माना जाता है। मान लें कि 10 सीटों पर चुनाव है और सभी 403 विधायक वोट डालते हैं। तब एक सीट के लिए करीब 37 विधायकों के पहली वरीयता वोट चाहिए।
खुला मतपत्र
राज्यसभा चुनाव में खुला मतपत्र होता है। किसी दल का विधायक वोट डालने के बाद अपना मतपत्र पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाता है। यह नियम क्रॉस वोटिंग पर नजर रखने के लिए 2003 में जोड़ा गया। इस चुनाव में NOTA का विकल्प नहीं होता।
विधान परिषद: यूपी के 100 सदस्य
यूपी उन राज्यों में है, जहां दो सदन हैं। इसलिए यहां राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव दोनों होते हैं। संविधान का अनुच्छेद 171 विधान परिषद की बनावट तय करता है। यूपी विधान परिषद के 100 सदस्य इस तरह चुने जाते हैं:
- 38 सदस्य विधायक चुनते हैं।
- 36 सदस्य स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि चुनते हैं।
- 8 सदस्य स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं।
- 8 सदस्य शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं।
- 10 सदस्य राज्यपाल मनोनीत करते हैं।
स्नातक क्षेत्र में वे लोग वोट डालते हैं, जिन्हें स्नातक हुए कम से कम तीन साल हो चुके हों। शिक्षक क्षेत्र में तय स्तर के शिक्षण संस्थानों में कम से कम तीन साल पढ़ा चुके शिक्षक वोटर होते हैं।
विधान परिषद भंग नहीं होती। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 साल होता है और हर दो साल में एक-तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं। सदस्य बनने के लिए न्यूनतम उम्र 30 साल है।
विधानसभा की संख्या क्यों अहम है
राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव में जीत काफी हद तक विधानसभा में दलों की ताकत से तय होती है। जिस दल के पास ज्यादा विधायक होते हैं, उसे ज्यादा सीटें मिलती हैं। अगर उम्मीदवारों की संख्या सीटों के बराबर हो, तो वोटिंग की जरूरत नहीं पड़ती और सभी निर्विरोध चुने जाते हैं।
संविधान का पूरा पाठ विधि मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव का हाल का उदाहरण हमारी रिपोर्ट यूपी राज्यसभा चुनाव में सभी 10 उम्मीदवार निर्विरोध में है। उम्मीदवारों के चयन पर भाजपा के जातीय समीकरण वाली रिपोर्ट भी देखें।


