UP Politics: यूपी में कुर्मी वोटबैंक का कितना है दम? 50 से ज्यादा सीटों पर है सीधा असर

UP Politics: 50 से ज्यादा सीटों पर कुर्मी वोटों का असर?
UP Politics: 50 से ज्यादा सीटों पर कुर्मी वोटों का असर?

संक्षेप में

  • उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कुर्मी समाज के राजनीतिक प्रभाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
  • विभिन्न अनुमानों के अनुसार, यूपी की कुल आबादी में कुर्मी और पटेल समुदाय की हिस्सेदारी करीब 6 से 8 प्रतिशत मानी जाती है।
  • राजनीतिक विश्लेषणों में करीब 50 से 60 विधानसभा सीटों पर कुर्मी मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। हालांकि, अलग-अलग आकलनों में यह संख्या बदलती है।

UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से चुनाव के नतीजे तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते आए हैं। यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की सुगबुगाहट शुरू होते ही राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। इस बार भी ओबीसी राजनीति के केंद्र में यूपी में कुर्मी वोटबैंक एक बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है। राज्य की लगभग 50 से 60 विधानसभा सीटों पर कुर्मी समाज का सीधा असर देखने को मिलता है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और अपना दल जैसे प्रमुख दल इस बड़े समुदाय को साधने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश की सत्ता और विपक्ष दोनों ही खेमों में कुर्मी नेताओं की बेहद मजबूत पकड़ है। करीब 40 विधायक इसी समुदाय से आते हैं, जो यूपी में कुर्मी वोटबैंक की राजनीतिक ताकत को साफ तौर पर दर्शाते हैं। आगामी चुनाव में यह वोटबैंक किस करवट बैठेगा, यह काफी हद तक सूबे की सत्ता का भविष्य तय करेगा।

UP Politics: यूपी में कुर्मी समाज की आबादी और उनकी पहचान

उत्तर प्रदेश में ओबीसी वर्ग के भीतर यादवों के बाद कुर्मी समाज को सबसे बड़ी जातियों में गिना जाता है। एक अनुमान के मुताबिक प्रदेश की कुल आबादी में कुर्मी-सैंथवार समाज की हिस्सेदारी करीब छह से सात प्रतिशत के आसपास है। यह आबादी संख्या के लिहाज से भले ही सीमित लगे, लेकिन चुनावी नतीजों को पूरी तरह पलटने का माद्दा रखती है। यूपी में कुर्मी वोटबैंक केवल एक नाम से नहीं जाना जाता। इस समुदाय के लोग पटेल, गंगवार, सचान, कटियार, निरंजन, चौधरी और वर्मा जैसे कई अलग-अलग उपनामों का भी इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, केवल उपनाम के सहारे किसी व्यक्ति की जाति का सटीक अंदाजा नहीं लगाया जा सकता क्योंकि ऐसे उपनाम कई अन्य समुदायों में भी काफी प्रचलित हैं। फिर भी, राजनीतिक दल इसी सामाजिक ताने-बाने को ध्यान में रखकर जमीनी स्तर पर अपनी रणनीतियां तैयार करते हैं।

इन क्षेत्रों और विधानसभा सीटों पर है गहरा प्रभाव

कुर्मी समाज का राजनीतिक प्रभाव राज्य के किसी एक कोने तक सीमित नहीं है। पूर्वांचल से लेकर अवध, रुहेलखंड, तराई और बुंदेलखंड के कई हिस्सों में इस समुदाय का दबदबा साफ देखा जा सकता है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार महाराजगंज, संत कबीर नगर, कुशीनगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव और जालौन जैसे जिलों में यह समाज निर्णायक भूमिका में है। इसके अलावा फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, प्रयागराज, सीतापुर और लखीमपुर खीरी में भी यूपी में कुर्मी वोटबैंक का गहरा असर रहता है। पूरे प्रदेश की करीब 50 से 60 विधानसभा सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां कुर्मी मतदाता किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार तय कर सकते हैं। राजनीतिक पार्टियां इसी क्षेत्रीय प्रभाव को भुनाने के लिए इन इलाकों में इस समाज के कद्दावर नेताओं को चुनावी मैदान में उतारना पसंद करती हैं।

यूपी की सत्ता में कुर्मी नेताओं की मजबूत हिस्सेदारी

राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में यह समुदाय अब काफी आगे निकल चुका है। वर्तमान उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुर्मी समाज से आने वाले 40 विधायक मौजूद हैं। इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीय जनता पार्टी और उसके गठबंधन की है, जिसके पास कुल 27 विधायक हैं। वहीं, समाजवादी पार्टी के टिकट पर 12 और कांग्रेस से एक विधायक चुनकर सदन में पहुंचे हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक यूपी में कुर्मी वोटबैंक का यह शानदार प्रदर्शन लगातार कायम है। इतना ही नहीं, राज्य सरकार के मंत्रिमंडल में भी इस समाज के नेताओं को अहम जिम्मेदारियां मिली हुई हैं। स्वतंत्र देव सिंह, राकेश सचान, संजय गंगवार और आशीष पटेल जैसे दिग्गज नेता कैबिनेट मंत्री के तौर पर सरकार का अहम हिस्सा हैं, जो समुदाय के बढ़ते राजनीतिक कद को और ज्यादा पुख्ता करते हैं।

लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिला समुदाय का दमखम

सदन में हिस्सेदारी सिर्फ विधानसभा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में भी इस समाज का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश से कुर्मी समाज के कुल 11 सांसद चुनकर दिल्ली पहुंचे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से सबसे ज्यादा सात सांसद समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते हैं। इसके अलावा तीन सांसद भाजपा से और एक अपना दल (एस) से जीतकर आए हैं। साल 2019 के आम चुनावों में इस समुदाय से आठ सांसद चुने गए थे। सांसदों की यह बढ़ती हुई संख्या इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यूपी में कुर्मी वोटबैंक किसी एक राजनीतिक दल का बंधुआ नहीं है। अलग-अलग पार्टियों ने इस समाज के नेताओं पर भरोसा जताया और मतदाताओं ने भी खुलकर उनका साथ दिया।

UP Politics: सियासी दलों की नजर और भविष्य की चुनावी रणनीति

कुर्मी समाज की इसी ताकत को देखते हुए सभी प्रमुख पार्टियां उन्हें लुभाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। भारतीय जनता पार्टी ने पंकज चौधरी को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की अहम कमान सौंपी है। वहीं, पूर्वांचल के इलाके में अनुप्रिया पटेल अपना दल (एस) के जरिए इस समुदाय का सबसे बड़ा और विश्वसनीय चेहरा बनी हुई हैं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने भी कई दिग्गज कुर्मी नेताओं को अपने साथ जोड़कर जमीन पर अपनी मजबूत पैठ बना ली है। इसके अलावा अपना दल के दूसरे धड़े की कमान संभाल रहीं कृष्णा पटेल और पल्लवी पटेल भी राजनीतिक समीकरणों में अपनी अहम भूमिका निभा रही हैं। 2027 के चुनाव से पहले कोई भी दल इस बड़े तबके को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकता है।

उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास को देखते हुए यह साफ है कि आगामी विधानसभा चुनाव 2027 में जातीय गोलबंदी एक बार फिर हावी रहेगी। यूपी में कुर्मी वोटबैंक का बड़ा आकार, उनका व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव और मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व उन्हें सत्ता की चाबी सौंपता है। हालांकि, आज का मतदाता काफी जागरूक हो चुका है। वह केवल जाति के आधार पर वोट देने की बजाय रोजगार, स्थानीय विकास, उम्मीदवारों की छवि और सरकार के कामकाज का भी बारीकी से आकलन करता है। ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चुनाव के समय कौन सी राजनीतिक पार्टी इस अहम वोटबैंक को अपने पक्ष में पूरी तरह से लामबंद करने में सफल हो पाती है और सत्ता के सिंहासन तक पहुंचती है।

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Sudhanshu Tiwari

Sudhanshu Tiwari

सुधांशु तिवारी UP Election News (upelectionnews.com) के संस्थापक और संपादक हैं। वे उत्तर प्रदेश की राजनीति, 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों, राज्यसभा और उपचुनावों, चुनाव आयोग से जुड़ी खबरों और ओपिनियन पोल पर लिखते हैं। वेबसाइट पर क्या प्रकाशित होगा, इसका अंतिम फैसला और प्रकाशित खबरों की संपादकीय ज़िम्मेदारी उन्हीं की है। UP Election News का संचालन DB PR Solution करती है; जिन खबरों में DB PR Solution के किसी क्लाइंट या उसके अपने सर्वे का ज़िक्र होता है, उन पर अलग से खुलासा (डिस्क्लोज़र) दिया जाता है। किसी खबर में गलती दिखे तो info@upelectionnews.com पर लिखें।

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